किन्नर की रियल लाइफ कहानी: कैसे दिन में दुत्कारने वाले समाज ने रात में बनाया सेक्स वर्कर

Special Desk : New Delhi

मां की कोख से जब जन्म लिया तो घर में बेटा पैदा होने की खुशी मनाई गई। माता-पिता के साथ दादा-दादी सभी खुश थे। दादा ने यह सोचकर रिजवान नाम रखा कि इस बच्चे के अंदर नेतृत्व करने की क्षमता है। समय के साथ स्कूल जाने लगा और तालीम लेने के लिए पास के मदरसे में भी। जब 13 साल का हुआ तब शारीरिक हाव-भाव में बदलाव आने लगा। कभी बहन के दुपट्‌टे को लेकर खेलता था तो कभी उसे ओढ़कर मदरसे में भी चला जाता था। इसे देख गांव के लोगों ने किन्नर कहना शुरू कर दिया। दादा से कहा गया कि आपका पोता तो किन्नर है। इसके बाद मेरे साथ पढ़ने वाले दोस्त दूरी बनाने लगे। परिवार साथ देना चाहता था मगर समाज को देख वह भी नजरअंदाज करने लगे। किसी तरह 2 साल और गुजारे।

समाज ने 15 साल की उम्र में घर छोड़ने पर किया मजबूर

 

रिजवान बताते हैं कि 15 साल के होने पर नोएडा आ गया। इस तरह पढ़ाई छूट गई। परिवार छूट गया। काम करने के लिए कुछ नहीं था तो एक फैक्ट्री में सफाई करने लगा। कुछ महीने बाद वहां के मैनेजर को समझ में आ गया कि मैं किन्नर हूं। इसलिए नौकरी से निकाल दिया। 15 दिन के पैसे भी नहीं दिए। हाथ खाली था। कुछ समझ में नहीं आया। तब मजबूरी में नोएडा सेक्टर-15 के पास की झाड़ियों में सेक्स वर्कर बन गए। इससे पैसे कमाने लगा तो दो वक्त का खाना मिल जाता था। बचपन में पढ़कर एडवोकेट बनने का सपना टूट चुका था। महज 17 साल की उम्र में रिजवान से मैं रामकली बन गई। नोएडा में सेक्स वर्करों के बीच रामकली का नाम चर्चा में आने लगा।

ये समाज है : दिन में जो बात तक नहीं करते थे वो रात में शादी तक कर लेते थे और सुबह होते ही तलाक़

रिजवान ने बताया कि दिन में समाज के जो लोग हमें गंदा बताकर दूर भगा देते थे उनमें से कुछ लोग रात होते ही गले लगा लेते थे। यहां तक कि मांग में सिंदुर डालकर शादी तक कर लेते थे और सुबह होते ही तलाक दे देते थे। उस समय लगा अब यही जिंदगी है। पूरी जिंदगी इसी तरह रोज रात में शादी और सुबह तलाक से ही गुजारनी पड़ेगी। मगर जब मन में कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश हो तो एक न एक दिन आप जरूर आगे बढ़ते हैं। यही मेरे साथ हुआ।

एचआईवी जागरूकता के एक निमंत्रण पत्र ने बदल दी जिंदगी

जब इस तरह की जिंदगी गुजारने को मजबूर थी तभी दिल्ली की एक संस्था ने ट्रांस जेंडर में एचआईवी को लेकर जागरूक करने के लिए निमंत्रण भेजा। वहां जाने पर समझ में आया कि एचआईवी ऐसी बीमारी है जिससे खुद की जिंदगी खराब होने के साथ वह जिसके साथ सेक्सुअल संपर्क में आती है उसे भी संक्रमण का खतरा है। यह भी बताया गया कि ट्रांस जेंडर होने में उनकी क्या गलती है। यह तो प्राकृतिक देन है। उसी समय यह सोच लिया कि अब सेक्स वर्कर छोड़कर खुद की नई पहचान बनानी है।

अपने साथ उन सभी ट्रांसजेंडर के सपनों को भी पंख लगाना है जो बचपन से ही परिवार से अलग हो गईं और मजबूरी में सेक्स वर्कर बन गईं। उनमें से कई एचआईवी संक्रमित हैं और इससे दूसरे भी संक्रमण का शिकार हो रहे हैं। इसके बाद रामकली से फिर खुद की रिजवान के रूप में पहचान बनाई।

2011 में जिंदगी में आया नया सवेरा, बनाया बसेरा संस्था

नोएडा की कुछ सेक्स वर्करों के साथ मिलकर नई सुबह के साथ शुरुआत करने के लिए ‘बसेरा’ नामक संस्था बनाई। इसके बाद ट्रांस जेंडर को समाज में स्थान दिलाने के लिए ‘पहचान’ नाम से एक प्रोजेक्ट को शुरू किया। 2011 में बसेरा के तहत शुरू किए पहचान प्रोजेक्ट को देश के साथ ग्लोबल एंप्लीफाई चेंज संस्था ने भी सपोर्ट दिया। इसके बाद 2014 में जब सुप्रीम कोर्ट ने भी समानता के अधिकार के तहत मेल, फीमेल के साथ थर्ड जेंडर को मौका दिया तब जाकर हमलोग नौकरी पाने के लिए प्रयास करने लगे।

ट्रांसजेंडर ने खड़ा किया सबसे मजबूत ‘वजूद’

इसके बाद ट्रांस जेंडर के अस्तित्व को समाज में दिखाने के लिए ‘वजूद’ प्रोजेक्ट को शुरू किया। ऐसा इसलिए क्योंिक अब ट्रांस जेंडर को भी समाज में वजूद चाहिए इसके लिए लगातार प्रयास कर रही हूं। अब वजूद संस्था दिल्ली-नोएडा के अलावा 4 राज्यों गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी कार्यरत है।

हर 30 दिन पर ट्रांसजेडर का कराती हैं एचआईवी टेस्ट

रिजवान के साथ अब नोएडा-एनसीआर से 1500 से ज्यादा ट्रांसजेंडर जुड़ चुके हैं। इनमें से 150 का एचआईवी टेस्ट भी कराया। इनमें से 30 में एचआईवी पॉजिटिव मिला है। ट्रांस जेंडर के अलावा 40 से ज्यादा अन्य लोगों को भी एचआईवी के प्रति जागरूक करते हुए टेस्ट कराया गया है। रिजवान का कहना है कि अब उनका मकसद ट्रांस जेंडर के साथ हर किसी को जागरूक कर स्वस्थ समाज बनाना है।

बबली को हाईकोर्ट में दिलाई नौकरी अब कई और को भी तैयारी

बसेरा और वजूद संस्था की सक्रियता की वजह से ही सितंबर 2017 में ट्रांसजेंडर बबली को हाईकोर्ट में नौकरी मिली थी। बबली 10वीं पास हैं। वह कई जगह नौकरी के लिए आवेदन करती थीं मगर ट्रांसजेंडर होने की वजह से सफलता नहीं मिली। इसके बाद संस्था की तरफ से पहल की गई जिसके बाद दिल्ली स्टेट लीगल सर्विस अथॉरिटी ने एसिड अटैक पीड़ितों के साथ ट्रांसजेंडर को नौकरी दिलाई थी।

ये 60 फीसदी नंबर लेकर डीयू से ग्रेजुएट, जॉब के लिए एग्जाम देने से रोका तो संस्था में दे दी नौकरी

दिल्ली में ही मेरा जन्म हुआ। 12वीं तक कॉमर्स से पढ़ाई की। इसके बाद बीए करने के लिए डीयू में एडमिशन लेने आई तो रेग्युलर दाखिला नहीं मिला। इसलिए पत्राचार से पढ़ाई की। वीकेंड पर क्लास जाती थी तो अन्य छात्र दूरी बना लेते थे। फिर भी 60 फीसदी अंक के साथ पास हुई। नौकरी के लिए फॉर्म भरा तो उसमें जेंडर के नाम पर मेल को चुना। मगर एग्जाम देने जब मुंह को ढककर पहुंचे तो सेंटर पर ट्रांसजेंडर बता निकाल दिया गया। अब रिजवान से मिली तो उन्हें गुरु माना और उनकी संस्था के लिए काम कर खर्चा चला रही हूं। अब सोशल वर्क में मास्टर डिग्री करके नौकरी पाने की कोशिश है।
– काजल, ट्रांसजेंडर

मैं भी दिल्ली यूनिवर्सिटी से बीए पास हूं। इसके बाद नौकरी करना चाहती थी। मगर कहीं नौकरी नहीं मिली। हर जगह ट्रांसजेंडर बताकर कंपनी के गेट से ही बाहर कर दिया गया। समाज के लोग भले ही दिन में दुत्कार देते थे मगर रात में सेक्सुअल रिलेशन बनाने के लिए संपर्क कर लेते थे। मगर अब फिर से खुद की नई पहचान बनाने के लिए प्रयास कर रही हूं। कई संस्थाओं से मदद मिल रही है। अब देखते हैं कि ट्रांसजेंडरों की जिंदगी में सामाजिक रूप से कब सवेरा आएगा।
– रूही, ट्रांसजेंडर

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