POCSO ACT : पीड़ित बच्चे का प्राइवेट अस्पताल भी फ्री में करेगा इलाज, मना किया तो जेल

2012 में पॉक्सो एक्ट लागू किया गया था। इस कानून में 18 साल से कम उम्र के लड़के, लड़की और थर्ड जेंडर को भी शामिल किया गया है। इसके पीड़ित बच्चे को यह अधिकार है कि उसे तत्काल किसी भी अस्पताल चाहे वो प्राइवेट हो या नर्सिंग होम या सरकारी अस्पताल, सभी में फ्री में बेहतर इलाज मिले। मगर जानकारी के अभाव में पुलिस भी इस बारे में लोगों को जागरूक नहीं करती है और लोग सरकारी अस्पताल में चक्कर लगाने से परेशान होते है।

 

Ishan : New Delhi

क्या आप जानते हैं कि हमारे देश में हर दूसरा बच्चा किसी न किसी रूप में अब्यूज या सेक्सुअल असॉल्ट हो रहा है। दरअसल, बच्चों के प्रति होने वाले क्राइम से संबंधित एक सर्वे रिपोर्ट से पता चलता है कि देश में 53 पर्सेंट से ज्यादा बच्चे ऐसी घटनाओं के शिकार हो रहे हैं। मगर चौंकाने वाली बात है कि उनके माता-पिता आधे से भी कम बच्चों की परेशानी समझ पाते हैं। मतलब, ज्यादातर मामलों में तो माता-पिता समझ ही नहीं पाते कि उनका बच्चा किसी तरह के असॉल्ट या अब्यूज से परेशान है। इसके अलावा जिन्हें पता भी चल जाता है उनमें भी एक तिहाई से ज्यादा पुलिस थाने में जाकर शिकायत करने से बचते हैं और बच्चे को ही आरोपी से दूर कर पीछा छुड़ा लेते हैं।

मगर, यहां सवाल सिर्फ आरोपी से बच्चे को अलग करने का नहीं  है बल्कि उसके मन से हमेशा के लिए उसके साथ हुई घटना को दूर करना है। इसके लिए बेहतर तरीके से काउंसलिंग कराना बेहद जरूरी है। यह समझाना भी जरूरी है कि गलत काम करने वाला चाहे वो कोई अपना हो या बाहरी, सभी को सजा मिलनी ही चाहिए। इसीलिए पॉक्सो एक्ट के जरिए एफआईआर कराना और फिर सजा दिलाना जरूरी है।

कई बार ऐसा भी होता है कि लोग बच्चे को सरकारी अस्पताल में भर्ती कराने से बचने का सोचते हैं या फिर कई बार प्राइवेट अस्पताल में ज्यादा खर्च से बचने के लिए भी दूरी बना लेते हैं। मगर आपको यह जानना जरूरी है कि बच्चों के साथ हुए सेक्सुअल असॉल्ट के मामले में उसका इलाज किसी भी प्राइवेट या सरकारी अस्पताल में पूरी तरह से फ्री में करा सकते हैं। यह कानून में है। अगर कोई अस्पताल मना करे या पैसे मांगे तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। अस्पताल प्रबंधक को जेल भी हो सकती है।

क्या है POCSO ACT

पॉक्सो एक्ट यानी The Protection Of Children From Sexual Offences Act-2012 (POCSO ACT) बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराध या सेक्सुअल असॉल्ट व अब्यूज से सुरक्षा और सजा दिलाता है। इस एक्ट में 18 साल से कम उम्र का लड़का हो या लड़की या थर्ड जेंडर सभी शामिल हैं। सेक्सुअल हैरसमेंट, सेक्सुअल असॉल्ट, पोर्नोग्राफी व अन्य तरह के उत्पीड़न को इस एक्ट में शामिल किया गया है। दरअसल, आईपीसी में सेक्सुअल ऑफेंसेस से सुरक्षा के खास प्रावधान शामिल नहीं हैं। इसलिए इस एक्ट को नवंबर 2012 में लागू किया गया था।

इस एक्ट को इन खास तथ्यों से समझें

घर का सदस्य हो या स्कूल टीचर या डॉक्टर, उत्पीड़न का पता चलते ही सूचना देना जरूरी

Pocso act के सेक्शन-21 (1) में कहा गया है कि बच्चे के साथ सेक्सुअल असॉल्ट की जानकारी होने के बावजूद अगर माता-पिता, डॉक्टर, स्कूल प्रशासन और अन्य विश्वसनीय लोग शिकायत दर्ज कराने में लापरवाही करते हैं तब उनके खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है। दरअसल, ऐसा कई बार होता है कि रूटीन जांच में डॉक्टर को भी बच्चे के साथ हुए उत्पीड़न का पता चल जाता है लेकिन वह जानकारी नहीं देता है। इसी तरह हाल में ही देश के नामी डीपीएस जैसे स्कूल ने भी बच्ची के साथ हुए असॉल्ट की घटना की जानकारी के बाद भी पुलिस को शिकायत नहीं दी थी। ऐसे में इस कानून की यह खासियत जानना जरूरी है।

लापरवाही बरतने पर 6 महीने की जेल व जुर्माना भी

जानकारी होने के बाद भी पुलिस को सूचना नहीं देने पर पॉक्सो एक्ट में 6 महीने की जेल या जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है। डॉक्टर के लिए खासतौर पर निर्देश है कि अगर उसे बच्चे के साथ सेक्सुअल असॉल्ट की जानकारी होती है तब पुलिस को सूचित करना उसकी लीगल ड्यूटी है।

किसी भी पीड़ित बच्चे का प्राइवेट अस्पताल में भी होगा फ्री में इलाज

इस एक्ट की सबसे खास बात है कि किसी भी बच्चे चाहे वो लड़का हो या लड़की, अगर उसके साथ दुष्कर्म जैसी घटना या अन्य चोट लगती है तो उसका इलाज कराने के लिए सरकारी अस्पताल ही जाना जरूरी नहीं है। पीड़ित बच्चे का इलाज नजदीक के किसी भी प्राइवेट अस्पताल या नर्सिंग होम में भी कराया जा सकता है। ऐसे पीड़ित बच्चे के इलाज के लिए कोई भी अस्पताल किसी भी तरह का पैसा नहीं ले सकता है। इस पॉक्सो एक्ट के सेक्शन 19 (5), सेक्शन-27 और नियम-5 में इस बात का स्पष्ट तौर पर जिक्र है। अगर पुलिस भी इससे मना करे तो आप इस कानून के बारे में बता सकते हैं।

बिना वर्दी में ही पुलिस करेगी बात, पीड़ित लड़की से सिर्फ महिला ही करेगी बात

Pocso act में साफ निर्देश है कि पीड़ित से पूछताछ उसके पसंद की जगह पर की जाएगी। इसके अलावा सब इंस्पेक्टर या इससे ज्यादा रैंक वाले अधिकारी ही पीड़ित से जानकारी ले सकेंगे। वह भी बिना वर्दी में ही बातचीत कर सकेंगे। इसके अलावा, अगर पीड़ित बच्ची है तो सिर्फ महिला दरोगा ही बात करेगी और मेडिकल जांच सिर्फ महिला डॉक्टर ही करेगी।

पुलिस की जिम्मेदारी : 24 घंटे में चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को दे सूचना 

इस एक्ट में प्रावधान है कि मेडिकल जांच भी पैरंट्स या फिर उसके किसी विश्वसनीय की मौजूदगी में होगी। पुलिस को यह जिम्मेदारी है कि इस घटना के बारे में 24 घंटे में चाइल्ड वेलफेयर कमिटी (सीडब्ल्यूसी) जरूर दें। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि बच्चे की काउंसलिंग की जा सके जिससे उसे इस मानसिक आघात से उबरने का मौका मिले।

एक्ट में कितनी सजा का प्रावधान है

  • पेनेट्रेटिव सेक्सुअल ऑफेंस के लिए सेक्शन-4 में 7 साल से आजीवन कारावास तक और जुर्माना।
  • सेक्सुअल असॉल्ट के लिए सेक्शन-7 में 5 से 7 साल तक की सजा और जुर्माना भी हो सकता है।
  • सेक्सुअल हैरसमेंट के लिए सेक्शन-11 के तहत 3 साल की सजा और जुर्माना दोनों हो सकता है।
  • चाइल्ड प्रोनोग्राफी के लिए सेक्शन-13 के लिए 5 साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।

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