death penalty in india : इन 4 लोगों को कभी नहीं दे सकते हैं फांसी की सजा

विशेष : हमारे देश में फांसी की सजा यानी मृत्युदंड या Capital Punishment या Death Penalty असंवैधानिक नहीं है

फांसी की सजा सुनते ही कई बातें दिमाग में आती हैं। थोड़ा कन्फूजन भी होता है और सवाल भी कि क्या आज भी फांसी की सजा होनी चाहिए। मतलब, जब जीने का अधिकार हमारा मौलिक अधिकार है तो क्या इसमें मौत की सजा देना भी शामिल है। इस तरह न जाने कितने सवाल मन में आते हैं। यह भी कि क्या आज जब हम 21वीं सदी में आ चुके हैं तो भी क्या फांसी की सजा जरूरी है। क्या कोई और तरीका नहीं है जिससे किसी को सुधारने का मौका दिया जा सके। इन सब बातों पर चर्चा करेंगे मगर यहां एक बात साफ कर देना जरूरी है कि हमारे देश में फांसी की सजा यानी मृत्युदंड या Capital Punishment या Death Penalty असंवैधानिक नहीं है। मतलब, किसी व्यक्ति को कानूनी तौर पर न्यायिक प्रक्रिया के तहत किसी गंभीर अपराध के लिए दोषसिद्ध हो जाने पर मौत की सजा दी जा सकती है। हालांकि, इस सजा को भारत में दुर्लभ से दुर्लभतम केस में दिया जाता है।

 

मगर ध्यान रहे इन 4 श्रेणी में कभी फांसी नहीं दी जा सकती है…

भले ही दुर्लभ से दुर्लभतम अपराध ही क्यों न हो, मगर इन्हें भारत में कभी फांसी नहीं दी जा सकती है। ये हैं

– 15 वर्ष से कम आयु के बच्चे :

दरअसल, यह माना गया है कि 15 साल के कम आयु वाले बच्चे किशोर अवस्था या बाल्यावस्था में आएंगे। इनके द्वारा किया गया अपराध मृत्युदंड से परे ही माना जाएगा।

– मानसिक रूप से विक्षिप्त :

अगर कोई व्यक्ति मानसिक रूप से विक्षिप्त है तो उसे भी फांसी की सजा नहीं दी जा सकती है। दरअसल, यह माना जाता है कि जब उसने क्राइम किया तो वह पूरी तरह से होशो-हवाश में नहीं था। इस तरह उसकी मंशा ऐसी घटना को अंजाम देने की नहीं रही होगी।

– गर्भवती महिलाएं :

अगर कोई महिला गर्भवती है तो उसे भी फांसी नहीं दी जा सकती है। इसकी वजह है कि अपराध उस महिला ने किया है लेकिन उसके गर्भ में पल रहे बच्चे का इस केस से कोई मतलब नहीं है। लिहाजा, उस महिला को ऐसी सजा नहीं दी सकती है।

– 70 वर्ष से अधिक उम्र :
इस उम्र को लोगों को अति बुजुर्ग की श्रेणी में रखा गया है। ऐसे में अगर यह कोई दुर्लभतम अपराध भी करते हैं तो इसके पीछे बड़ी मजबूरी रही होगी या आत्मरक्षा में ही कदम उठाया होगा। ऐसे में इन्हें फांसी की सजा नहीं दी जा सकती है।

 

भारत में किस श्रेणी के अपराध में है मृत्यदंड, जानें…

faasi ki saja
source -aajtak online capital punishment in india

– मर्डर, हत्या के साथ डकैती करना
– राज्य के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह करना
-अल्प वयस्क या मानसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति को आत्महत्या के लिए प्रेरित करना
– किसी निर्दोष व्यक्ति को फांसी की सजा दिलाने तक झूठी गवाही देना
– किसी दूसरे देश को अपने देश की खुफिया जानकारी देना या लीक करना
– सती कार्य में सहयोग देना या सती प्रथा के लिए किसी को प्रेरित करना
– दुष्कर्म की ऐसी घटना जिसमें महिला को इस तरह से प्रताड़ित किया जाए जिससे उसकी मौत हो जाए या वह महिला अपना शारीरिक व मानसिक संतुलन खो दे

 

भारत में सार्वजनिक रूप से नहीं दी जा सकती है फांसी

अपने देश में फांसी की सजा को लेकर कई खास विशेषताएं हैं। उनमें से सबसे खास यह है कि किसी को भी भारत में सार्वजनिक रूप से फांसी की सजा नहीं दी सकती है। इसके अलावा मृत्युदंड केवल कुछ चयनित अपराधों के लिए ही दिया जायगा। मृत्युदंड देने के लिए किसी भी तरह का कोई कष्टदायी तरीका नहीं अपनाया जाएगा। यहां यह जानना भी जरूरी है कि मृत्युदंड केवल शासन सत्ता द्वारा दिया जाता है।

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सुप्रीम कोर्ट का मत :

जगमोहन केस में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि मृत्युदंड भारत में असंवैधानिक नहीं है। लिहाजा, यह स्पष्ट है कि भारत में इस सजा की अनुमति है। यहां जानना जरूरी है कि इस सजा का एक मापदंड तय कर पाना आपराधिक कानून में संभव नहीं है। इसीलिए इस प्रकरण को लेकर न्यायालय के न्यायाधीशों को विवेकाधिकार दिए गए हैं। इसी विवेकाधिकार के तहत वे सजा तय कर सकते हैं। हालांकि, इसे चुनौती दी जा सकती है। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट यह देखेगा कि न्यायाधिश ने विवेकाधिकार का सही प्रयोग किया है या नहीं।

भारत में मृत्युदंड दिए जाने के इतिहास पर एक नजर :

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हाल में हुई फांसी की सजा : source aajtak online

भारत में मुगल काल में भी मृत्युदंड दिया जाता था। हालांकि, इस सजा को देने के लिए बर्बर तरीका अपनाया जाता था। इसके अलावा ब्रिटिश काल में भी खूब फांसी की सजा दी गई। 1814 में तीन किशोरों को अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी। इसके अलावा देश के स्वतंत्रता सेनानियों व क्रांतिकारियों को समय-समय पर ब्रिटिश हुकूमत फांसी की सजा देती रही थी।

विश्व में पहली फांसी की सजा अमेरिका में, फिर अंगूर चुराने व इंडिया से व्यापार करने पर भी देने लगे थे मृत्युदंड

मृत्युदंड देने का विश्व में पहला मामला ब्रिटिश हुकूमत में अमेरिका के वर्जीनिया में आया था। 1608 में वर्जीनिया की जेम्सटाउन कॉलोनी में कैप्टन जॉर्ज कैंडल को मृत्यदंड दिया गया था। इस पर स्पेन के लिए अमेरिका में जासूसी करने का दोष लगा था। इसके बाद 1612 में ही वर्जीनिया के गर्वनर सर थॉमस डेल ने मामूली क्राइम पर भी मृत्युदंड देने का कानून बना दिया था। इसमें अंगूर चुराने पर भी फांसी की सजा का कानून बना दिया। इसके अलावा अगर कोई इंडिया से व्यापार करता है तो भी उसे सजा दे दी जाती थी। इसके बाद 18वीं सदी में विश्व के कई देशों में खासतौर पर जहां ब्रिटिश हूकुमत थी वहां पर इसे लागू कर दिया गया था।

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