Abhinandan : पाकिस्तान से जारी घायल ‘अभिनंदन’ ही जिनेवा कन्वेंशन के लिए बना सबूत

स्पेशल स्टोरी : आखिर जिनेवा कन्वेंशन की वो कौन सी बात थी जिसके बाद अभिनंंदन को रिहा करने के लिए पाक हुआ मजबूर
 



विंग कमांडर अभिनंदन की रिहाई को लेकर जिस जिनेवा कन्वेंशन की खूब चर्चा रही उसमें क्या आप जानते हैं कि उसकी शुरुआत कब हुई थी और किस वर्ष वाले जिनेवा कन्वेंशन की वजह से पाकिस्तान को रिहाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस रिहाई के पीछे एक खास वजह और रही वो है पाकिस्तानी सोशल मीडिया पर अभिनंदन की फोटो व वीडियो वायरल कराना। दरअसल, सोशल मीडिया पर अभिनंदन के खून से सने चेहरे और पाकिस्तानी सैनिकों से घिरे जिस वीडियो को लेकर काफी चर्चा रही थी, सही मायनों में यही फोटो व वीडियो ही विंग कमांडर की रिहाई के लिए सबसे ज्यादा मददगार साबित हुए। हालांकि, इस तरह से किसी सेना के फोटो या वीडियो को दिखाना भी जिनेवा कन्वेंशन में गलत माना गया है। इस पर भारत ने आपत्ति भी जताई थी। मगर, हकीकत में सोशल मीडिया पर आई इस तरह की वीडियो व फोटो से ही यह 100 प्रतिशत पुख्ता हो पाया था कि विंग कमांडर पाकिस्तान में हैं। सुरक्षित हैं। सही-सलामत हैं और पाकिस्तानी सेना के हाथों में हैं। इसी पुष्टि होने की वजह से ही अभिनंदन पर जिनेेवा कन्वेंशन भी लागू हुआ और दुनिया भर में भारत की अच्छी व शांति चाहने वाली छवि की वजह से कूटनीति दबाव बढ़ा जिसकी वजह से पाकिस्तान के पीएम इमरान को मजबूर होकर अपनी संसद में अभिनंदन को भारत लौटाने का ऐलान करना पड़ा। अब आइए जानते हैं कि जिनेवा कन्वेंशन की कब शुरुआत हुई थी और इसकी क्यों जरूरत पड़ी थी।

हेनरी डुनेंट : इनके प्रयास से ही अस्तित्व में आया था जिनेवा कन्वेंशन 
 


1850 के आसपास की बात है। उसी समय से दुनियाभर में छोटे-मोटे युद्ध की शुरुआत हो गई थी। एक देश दूसरे देश से मर-मिटने तक लड़ता रहता था। ऐसे में दो देशों के बीच चल रहे युद्ध के दौरान किसी देश का सिपाही दूसरे के कब्जे में आ जाता था तो उसके साथ दिल दहला देने वाला अमानवीय व्यवहार किया जाता था। उसे काफी तड़पाया जाता था और वर्षों तक युद्धबंदी बनाकर यातनाएं दी जाती थी। उस समय न कोई कानून था और न ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा कोई कन्वेंशन हुआ था जो इस तरह के बर्ताव को रोकने का काम करे। ऐसे में वर्ष 1864 में युद्ध के समय घायलों की मदद करने के लिए एक पहल की गई। यह पहल रेड क्रॉस के संस्थापक हेनरी डुनेंट ने की। इनके प्रयास से जिनेवा कन्वेंशन को अस्तित्व में लाया गया था। हेनरी ने युद्ध के दौरान युद्धबंदियों, घायल और बीमार लोगों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए कदम उठाया था। इसके बाद उनके प्रस्ताव को स्वीकार किया गया तब जिनेवा कन्वेंशन और उसके प्रोटोकाल का मुख्य मकसद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवीय मूल्यों की रक्षा करना था।

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पहला जिनेवा कन्वेंशन : घायल व बीमार सैनिकों की सुरक्षा पर जोर

हेनरी डुनेंट की पहल पर पहला जिनेवा कन्वेंशन 1864 में हुआ। इसमें युद्ध के दौरान घायल और बीमार सैनिकों को सुरक्षा प्रदान करने की बात कही गई थी। इसमें साफतौर पर उल्लेख किया गया था कि युद्ध के समय किसी के पकड़े जाने पर उसके साथ अमानवीय व्यवहार नहीं किया जाएगा। उनकी धार्मिक आस्था का भी ध्यान रखा जाएगा।


दूसरा जिनेवा कन्वेंशन : समुद्री युद्ध बंदियों को सुरक्षा

दूसरा जिनेवा कन्वेंशन 1906 में हुआ था। इस कन्वेंशन में खासतौर पर समुद्री युद्ध और उससे जुड़े प्रावधानों को शामिल किया गया था। इसमें युद्ध के समय समुद्र में घायल, बीमार और जलपोत के सैन्य-कर्मियों की रक्षा और उनके अधिकारों की बात की गई थी।


तीसरा जिनेवा कन्वेंशन : युद्धबंदी को पहली बार किया गया परिभाषित

1929 में तीसरा जिनेवा कन्वेंशन अमल में लाया गया था। यह युद्धबंदियों पर लागू होता है। इस कन्वेंशन में किसी युद्ध में शामिल सैनिक के कैद की स्थिति सटीक रूप से परिभाषित किया गया है। दरअसल, यह कन्वेंशन प्रिजनर ऑफ वॉर यानी युद्धबंदी को परिभाषित करता है और ऐसे कैदियों को उचित और मानवीय उपचार देने के पक्ष में पहल करता है। खासतौर पर युद्धबंदियों को भी वित्तीय संसाधनों, उन्हें मिलने वाली राहत और उनके खिलाफ न्यायिक कार्यवाही के संबंध में प्रावधान तय करता है। इस कन्वेंशन में यह साफ है कि युद्धबंदियों को युद्ध की समाप्ति के बाद बिना देरी किए रिहा किया जाएगा।


चौथा जिनेवा कन्वेंशन : इसी कन्वेंशन की इस खास से अभिनंदन की रिहाई में मिली मदद

दूसरे विश्वयुद्ध में मानव अधिकारों को हुए नुकसान को देखते हुए ही 1949 में चौथे जिनेवा कन्वेंशन का आयोजन हुआ। यह 21 अक्टूबर 1950 से लागू है। इसमेंें तीसरे जिनेवा कन्वेंशन के नियम कानूनों में संशोधन किया गया। इस कन्वेंशन में युद्ध वाले क्षेत्र के साथ-साथ कब्जे वाले एरिया के नागरिकों के संरक्षण का भी जिक्र किया गया है। इसमें यह भी बताया गया है कि जहां युद्ध हो रहा है उसके आसपास के एरिया में रहने वाले नागरिकों और घायलों की भी देखभाल व इलाज कराना सुनिश्चित किया गया है।

बड़ा सवाल : जब युद्ध घोषित ही नहीं था तो क्या जिनेवा कन्वेंशन लागू होगा?
जवाब : इस तरह के सवाल की खूब चर्चा रही है। सोशल मीडिया से लेकर अन्य कई जगहों पर बहस करते हुए लोगों ने यह कहा कि जिनेवा कन्वेंशन तभी लागू होता है जब युद्ध घोषित हुआ होता है। इस दौरान अगर कोई दुश्मन देश का युद्धबंदी पकड़ में आता है तो उसकी देखभाल की जाती है और फिर उसे युद्ध की समाप्ति पर रिहा करना पड़ता है। दरअसल, ये बात भी सच है मगर 1949 के जिनेवा कन्वेंशन में यह साफ-साफ निर्धारित किया गया था कि यह कन्वेंशन उन सभी मामलों में लागू होता है चाहे युद्ध की घोषणा हुई हो या नहींं। इससे साफ होता है कि 1949 के कन्वेंशन से भले ही युद्ध की घोषणा नहीं हुई हो लेकिन किसी भी तरह से कोई सैनिक किसी दुश्मन की सीमा में चला जाता है तो उसके मानव अधिकारों की रक्षा की जाएगी और उसे रिहा भी करना पड़ेगा।

युद्धबंदी महिला होगी फिर भी लागू होगा जिनेवा कन्वेंशन

किसी भी देश का सैनिक जैसे ही पकड़ा जाता है उस पर जिनेवा कन्वेंशन तुरंत लागू हो जाता है। अब वह सैनिक चाहे महिला हो पुरुष, ये मायने नहीं रखता है। दोनों ही स्थिति में यह लागू होता है। कन्वेंशन में तय किया गया है कि उनकी उचित देखरेख और सुरक्षा दी जाएगी।


सैनिक का नाम व पद पूछ सकते हैं मगर जाति या धर्म नहीं, और क्या नहीं कर सकता है दुश्मन देश, जानें…

इसलिए अभिनंदन ने अपना पता नहीं बताया था… :  किसी भी बंदी से सिर्फ उनके नाम, सैन्य पद और नंबर के बारे में ही पूछा जा सकता है। मगर उसकी जाति, धर्म और जन्म व जन्मस्थान जैसी बातों को नहीं पूछा जा सकता। यही वजह है कि जब पाकिस्तानी सेना ने उनके घर व परिवार के बारे में पूछा तो अभिनंदन ने कोई जानकारी नहीं दी थी। दरअसल, उन्हें जिनेवा कन्वेंशन के नियमों की पूरी जानकारी थी।

इसलिए पाकिस्तानी सेना ने अभिनंदन का पूरा इलाज कराया….

जिनेवा कन्वेंशन के अनुच्छेद-3 के मुताबिक, किसी घायल बंदी का दुश्मन देश को बेहतर तरीके से इलाज कराना अनिवार्य है। ऐसा नहीं करने पर अनुच्छेद-3 का उल्लंघन माना जाएगा।

 

 

जिनेवा कन्वेंशन की अन्य खास बातें…

 

  • सैनिक को किसी भी प्रकार से प्रताड़ित या शोषित नहीं किया जाना चाहिए।
  • इस दौरान बर्बतापूर्ण व्यवहार और अमानवीय बर्ताव नहीं किया जा सकता है।
  • एक नागरिक को जितने यूनिवर्सल अधिकार मिले हैं वो सभी उस सैनिक को भी मिलेगा। कानूनी सुविधा भी मिलेगी।
  • दुश्मन देश किसी भी तरह से डरा या धमका नहीं सकता है। यहां तक कि उसे अपमानित भी नहीं कर सकता है।
  • युद्धबंदी के खिलाफ संभावित युद्ध अपराध के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है हालांकि हिंसा की कार्रवाई को लेकर किसी भी तरह का मुकदमा नहीं चलेगा।
  • अभिनंदन को रेडक्रॉस के प्रतिनिधि भारत सीमा तक आए थे सौंपने के लिए। दरअसल, किसी बंदी को लौटाने के लिए उन्हें पहले रेडक्रॉस को सौंपा जाता है उसके बाद रेडक्रॉस के प्रतिनिधि ही ऐसे सैनिकों को उनके देश तक ले जाते हैं।
भारत ने भी 1971 के युद्ध में 93000 पाकिस्तानी युद्धबंदियों को किया था रिहा
 

 

भारत हमेशा से अंतर्राष्ट्रीय समझौतों का पालन करता आया है। आपको बता दें कि 1971 में पाकिस्तान से युद्ध के समय भारत ने जिनेवा कन्वेंशन का पालन किया था। इसी के तहत भारत ने करीब 93 हजार पाकिस्तानी बंदियों के साथ मानवीय व्यवहार किया था और फिर उन्हें रिहा भी कर दिया था। इसके लिए शिमला समझौता भी किया गया था। आपको बता दें कि 13 दिन के युद्ध के बाद 16 दिसंबर 1971 को भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध को खत्म किया गया था। इस दौरान भारत में 93 हजार पाकिस्तानी सैनिक युद्धबंदी बनाए गए थे।

 

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