Aarushi Hemraj Murder mystery PART-1

एक बात

आप यह जरूर सोच रहे होंगे कि आखिर आरुषि-हेमराज डबल मर्डर केस को करीब 9 साल हो चुके हैं। उस समय से लेकर तलवार दंपति को सजा होने तक सबकुछ अखबार और न्यूज चैनल पर देखा ही है। इसके अलावा एक फिल्म भी आ चुकी है। शायद उसे भी देखा ही होगा। एक किताब भी आ चुकी है। हो सकता है उसे भी पढ़ लिया हो। अब आपसे ही सवाल है कि क्या आपके मन में उस केस को लेकर कोई सवाल नहीं है। यही सोचकर एक दिन मेट्रो में सफर के दौरान मैंने कुछ लोगों से चर्चा की। तब पता चला कि लोगों ने फिल्म भी देखी, खूब खबरें भी पढ़ीं और देखीं, लेकिन फिर भी मन में कई सवाल थे। इसके बाद कई ऐसे लोगों से बात की, जो मीडिया में तो थे, लेकिन आरुषि केस की रिपोर्टिंग में नहीं थे, परंतु देश-दुनिया की खबरें करते रहते थे, उन सबके मन में सवाल थे। इन 9 साल में मेरी स्टडी में हर सवाल का जवाब होता था, लेकिन एक-एक को मैं कितना और कैसे समझाता। फिर मुझे लगा कि भले ही मैंने इस हकीकत को लोगों के सामने लाने में देर की, लेकिन अभी ज्यादा देर नहीं हुई। मैंने सोचा कि क्यों न लोगों से पहले इस केस को लेकर उनकी सोच और जवाब की स्टडी की जाए। इसके बाद मैंने विभिन्न सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म, न्यूज पोर्टल से लेकर फेसबुक के जरिए लोगों से खुद सवाल पूछे और उनके विचार जाने। इस दौरान कुछ इस तरह की बातें सामने आईं। एक सवाल पूछा गया था कि क्या आपको लगता है तलवार कातिल है। जवाब इस प्रकार मिले,

65 प्रतिशत लोगों ने माना कि हां, तलवार ही कातिल है। साथ ही, कई सवाल भी किए। खुद से उस रात की अलग-अलग थ्योरी भी बताईं।

20 से 22 प्रतिशत लोगों ने कहा कि अभी कन्फ्यूज हैं इस बात को लेकर कि आखिर माता-पिता कैसे कत्ल कर सकते हैं। 10 प्रतिशत लोगों ने कहा कि कुछ भी हो सकता है। खुलकर कुछ नहीं कह सकते।

2-3 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे तलवार को कातिल नहीं मानते हैं। हालांकि, यह भी सच है कि इस दौरान तलवार को कातिल मानने वालों में 90 प्रतिशत से ज्यादा का कहना है कि उन्होंने अखबार या टीवी में न्यूज पढ़कर या देखकर ही अपनी राय दी है। जाहिर है क्राइम केस में लोग मौके पर तो जाएंगे नहीं, मीडिया के जरिए ही जानेंगे और उसके बारे में सोचेंगे। यहां आपको मीडिया के बारे में बता दूं कि आरुषि केस में कोई भी मीडियाकर्मी पहले दिन कमरे के अंदर तक नहीं पहुंचा था, जहां डेडबॉडी थी। जबकि, आपको बता दूं कि किसी भी मर्डर केस में क्राइम स्पॉट बिना देखे वहां क्या हुआ, इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं होता है।

हां, अटकलों पर भले ही कोई कुछ भी न्यूज बना ले। यही वजह है कि कई बार किसी केस में रिपोर्टर सिर्फ पुलिस की बताई कहानी के अनुसार चलने के लिए मजबूर हो जाता है। कई बार रिपोर्टर की जल्दबाजी भी अर्थ का अनर्थ बना देती है। यहां एक वाकया भी बताना चाहूंगा कि आरुषि मर्डर के एक हफ्ते बाद लखनऊ से आए एक पुलिस अधिकारी मीडिया से बात कर रहे थे, तभी देश के एक बड़े न्यूज चैनल के रिपोर्टर ने मिस्ट्री को लेकर बढ़ी उलझन पर पूछ लिया कि क्या आरुषि का पोस्टमॉर्टम दोबारा होगा और अन्य तथ्यों की जांच होगी? अब जरा सोचिए, कि 16 मई को ही जिसका पोस्टमॉर्टम हुआ और 17 मई की सुबह दाह-संस्कार हो गया, उसका दोबारा पोस्टमॉर्टम कैसे होता? पर यह सवाल पूछा गया था। इसका जिक्र करने का सिर्फ इतना मतलब है कि रिपोर्टिंग में ऐसी लापरवाही भी होती है और ऐसे भी रिपोर्टर स्टोरी करते हैं। इसलिए हर केस में बारीकी से खुद से इन्वेस्टिगेशन करना बेहद जरूरी है।

इस तरह पिछले 9 साल से आरुषि केस को लेकर किसी न किसी से अक्सर मेरी चर्चा होती रही है। कई बार मेरे करीबी दोस्तों ने कहा कि तुमने इस केस में एक तरह से पीएचडी कर ली है। कई ने कहा कि तुम्ही एक ऐसे शख्स हो, जो अलग बात करते हो, क्या बाकी लोगों की सोच गलत है? क्या वे लोग सही या गलत नहीं सोच सकते। मेरा जवाब होता था कि लोग हमेशा सही सोचते हैं, लेकिन अपने अनुसार। कोई गलत नहीं होता। बस, नजरिया और उसे समझने का फर्क है। अगर आप हर जवाब में सवाल और तर्क करना जानते हैं तो मेरा दावा है कि आपके सामने सच आएगा। इस केस को लेकर मैं दिन-रात सवालों और तर्कों में घिरा रहा। जहां सवाल उठता था तो उसके पीछे पूरी तरह लग जाता था। तब जाकर मुझे हर एक सवाल का जवाब मिला। अब जब मैं अपने तर्कों से लोगों के सवालों का जवाब देने लगा, तब मेरी पत्नी मोना ने कहा कि आप जब सच जानते हैं तो उसे कब तक एक-एक शख्स को बताते रहेंगे।

उसे किताब के जरिए लोगों तक क्यों नहीं लाते? सोचिए, इस दुनिया की इससे ज्यादा तकलीफ देने वाली बात क्या हो सकती है कि हम जिससे इतना प्यार करते हों, एक दिन उसे कोई मार दे और हम खुलकर रो भी नहीं पाएं, फिर उसी को मारने के जुर्म में पूरी ज़िंदगी जेल में गुजारें। कम से कम, उनकी मदद नहीं कर सकते तो हकीकत तो सामने लाइए। हम भी किसी के बच्चे हैं तो किसी के मां-बाप। माना, हमारे देश में माननीय कोर्ट से ऊपर कोई नहीं है। सब समान हैं, लेकिन इंसानियत भी कोई चीज है। भला सच से बड़ा कोई और बात हो सकती है क्या? क्या सच को सामने लाना गुनाह है। वो कैसा देश, जहां सच को दबाने के लिए ही क़ानून का सहारा लिया जाए।

इस तरह की कई बातें। फिर वही दोस्त, जो मेरा विरोध करते थे, उन्होंने भी जब सच स्वीकार कर लिया तो बोले, यह इन्वेस्टिगेशन सिर्फ हम दोस्तों तक नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के सामने लाओ। आखिरकार, मैंने फैसला ले लिया। सच को सामने लाऊंगा। यह सोचकर नहीं कि, मेरी किताब लोग पढ़ेंगे और एक दिन मेरा नाम होगा कि मैंने किताब लिख दी.. फलां..फलां…। बल्कि यह सोचकर कि आखिर कब तक सच को छुपाकर रखा जाएगा।

आरुषि

वर्ष 2008। देश की राजधानी दिल्ली से सटा यूपी का शहर नोएडा। यहां का सेक्टर-25ए जलवायु विहार इलाका काफी पॉश कॉलोनियों में शामिल है, जहां उच्च क्लास का तबका रहता है। यहां आर्मी अफसर से लेकर हाई प्रोफाइल लोग भी रहते हैं। इस जलवायु विहार के एल-ब्लॉक में राजेश तलवार अपने परिवार के साथ दूसरी मंजिल पर रहते हैं। वह पेशे से डॉक्टर हैं। पत्नी भी डॉक्टर। दोनों दांतों के स्पेशलिस्ट। एक बेटी। आरुषि तलवार। बचपन से ही नटखट। डांस की शौकीन। आसमां छू लेने की चाहत वाली। हर मौके को कैमरे में कैद में करने वाली। कॉपी और पेंसिल मिल जाए तो बस कोई न कोई तस्वीर बना देने वाली। मम्मी-पापा की चहेती। प्यारी और दोस्तों के बीच आरू। दरअसल, दोस्त और घरवाले उसे प्यार से आरू पुकारते थे।

बचपन से ही वह सब कुछ पा लेने की ख्वाहिश रखती थी। चाहे वह डांस हो, स्विमिंग कॉम्पिटिशन या अन्य टैलंट शो। सबमें हिस्सा लेती थी। जमकर तैयारी करती थी। फिर टॉप पर रहने के लिए कुछ भी कर जाती थी। इसी तरह अपने बर्थडे को भी हमेशा खास तरह से मनाती थी। घरवाले भी इसमें पूरा सपोर्ट करते थे। करते भी क्यों नहीं। आखिर इकलौती बेटी थी। वैसे भी बेटी तो घर की लक्ष्मी होती है, फिर उसे क्यों न वो सारी खुशियां देते, जिसे आजकल भी बहुत से ऐसे लोग हैं, जो बेटों को ही देने में दिलचस्पी रखते हैं। मगर आरू के साथ ऐसा नहीं था, उसे सारी खुशियां एडवांस में भी दी जाती थीं। उसे खुले आसमां में उड़ने की आजादी थी, क्योंकि क्या पता कल ज़िंदगी हो न हो।

उस दिन आसमां काफी साफ था। तेज धूप थी। गर्मी ज्यादा थी। तापमान करीब 40 डिग्री के आसपास था। दिन था 15 मई और साल 2008। आरू की उम्र 14 साल। क्लास 9वीं। स्कूल, नोएडा का फेमस डीपीएस। तपती गर्मी में वह स्कूल गई थी। जाती भी क्यों नहीं, स्कूल का आखिरी दिन जो था। आखिरी क्लास थी। दोस्तों से मिलने का आखिरी मौका। फिर तो गर्मी की छुट्टियों के बाद ही दोस्तों से मिलने का मौका मिल पाता। स्कूल का आखिरी दिन एक और वजह से आरुषि के लिए खास होता था। वह था आरुषि का बर्थडे। दरअसल, उसका बर्थडे 24 मई को आता था, लेकिन छुट्टी हो जाने से वह हर साल अपने क्लासमेट्स के साथ बर्थडे सेलिब्रेट नहीं कर पाती थी। इसीलिए वह साल में दो बार बर्थडे मनाती थी। पहला, जिस दिन से क्लासेस खत्म होने के बाद गर्मियों की छुट्टियां होती थीं, उसके एक या दो दिन आगे-पीछे और फिर 24 मई को नाना-नानी व अन्य फैमिली मेंबर्स के साथ। इस तरह वह हर पल को ही एक तरह से दो बार जीती थी। मगर, उसने यह सोचा भी नहीं होगा कि उसकी जिंदगी इतनी कम पलों की मेहमान होगी। पूरी जिंदगी जीने से पहले ही वह दुनिया छोड़ जाएगी। वह भी, एक रहस्य के साथ, जिसका सच अब तक पूरी तरह से सामने नहीं आया है।

रिपोर्टिंग

16 मई से तलवार की गिरफ्तारी तक

16 मई 2008: नोएडा में आरुषि का मर्डर

देश के सबसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र ग्रुप टाइम्स ऑफ इंडिया के हिंदी अखबार नवभारत टाइम्स में मेरी नई-नई जॉइनिंग हुई थी। दरअसल, 8 मई 2008 को ही मैंने नवभारत टाइम्स में स्थायी तौर पर काम करना शुरू किया था। इसकी मुझे काफी खुशी थी। जॉइनिंग के बाद टाइम्स ग्रुप की तरफ से सभी का मेडिकल टेस्ट कराया जाता है। मेरा मेडिकल टेस्ट का दिन था 16 मई 2008। सुबह 7 बजे ही मुझे नोएडा के सेक्टर-62 स्थित फोर्टिस अस्पताल में रिपोर्ट करना था। लिहाजा, उस दिन मैं सुबह 5:30 बजे ही जाग गया और 6:30 बजे तक तैयार हो गया। इसके कुछ देर बाद अपनी बाइक से अस्पताल के लिए निकल पड़ा। हालांकि, अस्पताल में 15 मिनट की देरी से रिपोर्ट कर पाया था। अस्पताल में मुझसे सैंपल लिए जाने लगे। सुबह करीब 8:15 बजे अचानक मोबाइल फोन की घंटी बजती है। कॉल करने वाला मेरा पुलिस दोस्त होता है। वह कंट्रोल रूम में तैनात था उस समय। खबरों को सूंघने में वह मेरी सबसे ज्यादा मदद करता था। इसलिए कॉल रिसीव करते ही मैंने हाल-चाल पूछने की कोशिश की, लेकिन वह काफी जल्दी में था। बस, इतना बताया कि सेक्टर-25 जलवायु विहार में किसी लड़की की मौत हो गई है। माता-पिता हाई प्रोफाइल है। गंभीर मामला है, देख लीजिए। इसके बाद फोन कट गया।

यह कोई पहला मामला नहीं था, जब मुझे सुबह-सुबह किसी मर्डर की जानकारी मिली हो। इसलिए मैंने सोचा कि अभी हॉस्पिटल का काम पूरा करूंगा, उसके बाद ही स्पॉट पर जाऊंगा। हालांकि, इसे नजरअंदाज भी नहीं किया। न्यूज चैनल वाले अपने एक दोस्त को इस घटना की सूचना दे दी, ताकि वह तुरंत मौके पर पहुंच जाए।

दरअसल, क्राइम की किसी भी घटना के लिए सबसे अहम होता है सीन ऑफ क्राइम। अगर क्राइम स्पॉट पर तत्काल पहुंचा जाए तो वहां केस को समझना काफी आसान होता है। इस बीच मेरे बताने के 15 मिनट में ही न्यूज चैनल वाला वह दोस्त जलवायु विहार पहुंच भी गया। वहां से उसने अपने अन्य साथियों को भी बुला लिया। उसने मुझे अपडेट भी किया कि घर के नौकर ने ही हत्या की है। वह फरार है। अब वह इस ब्रेकिंग न्यूज को अपने चैनल पर भी चलाने जा रहा था।

इस सूचना के बाद मैं अस्पताल में ही न्यूज चैनल भी देखने लगा। थोड़ी देर बाद पता चला कि जिस लड़की का कत्ल हुआ है, वह डीपीएस में पढ़ती थी। उसके पिता और माता दोनों डॉक्टर हैं। अब धीरे-धीरे मामला हाई प्रोफाइल बनता जा रहा था। अब यह खबर लगभग सभी न्यूज चैनल की हेडलाइंस में चल रही थी। नोएडा में डॉक्टर दंपति की बेटी का कत्ल, नौकर फरार…. डीपीएस में पढ़ती थी लड़की…नाम आरुषि तलवार बताया जा रहा था। कत्ल करने का आरोप.. नेपाली नौकर पर था। एक चैनल पर यह भी चल रहा था कि… भरोसे का कत्ल…।

यह सब देखकर मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। मन कर रहा था कि तुरंत क्राइम स्पॉट पर पहुंच जाऊं। इसलिए उसी चैनल वाले दोस्त को कॉल की। मैंने पूछा कि मौके पर कौन-कौन पुलिस अधिकारी है। उसने बताया कि यार अभी तो हम लोग के पहुंचते ही नए वाले आईपीएस अधिकारी एएसपी अखिलेश सिंह आए हैं। एसएसपी व एसपी सिटी में से कोई भी बड़ा अधिकारी नहीं पहुंचा है। मैंने पूछा, जहां कत्ल हुआ है, वहां की क्या स्थिति है? उसने बताया कि किसी भी मीडिया वाले को वहां नहीं जाने दिया गया है। डॉ. राजेश तलवार, जिसकी बेटी का कत्ल हुआ है, उसका सेकेंड फ्लोर पर फ्लैट है। मगर हम लोगों को ग्राउंड फ्लोर से ऊपर जाने ही नहीं दिया जा रहा है।

यह सुनकर मेरी उत्सुकता और बढ़ गई। अब तो तुरंत स्पॉट पर जाना ही होगा। आखिर क्या वजह है। इस दौरान मैंने उस समय के एसएसपी सतीश गणेश के पीआरओ को फोन किया। पीआरओ से पूछा कि एसएसपी कब तक स्पॉट पर जाएंगे। पीआरओ ने जवाब दिया कि एसएसपी साहब तो हॉस्पिटल में हैं। मैंने पूछा कि उसी मर्डर के मामले में ही क्या। जवाब मिला, नहीं। एसएसपी साहब तो वीआईपी विजिट की तैयारी में लगे हैं। मैंने कहा, मतलब, समझ नहीं पाया। कौन वीआईपी। जवाब मिला, एक दिन बाद संडे को पीएम और सोनिया गांधी दोनों नोएडा के मेट्रो हॉस्पिटल में एडमिट हरकिशन सिंह सुरजीत से मिलने आने वाले हैं। उन्हीं की तैयारी में सभी अधिकारी लगे हैं। यह सुनकर मैंने खुद ही फोन काट दिया। इसके बाद हॉस्पिटल में अन्य सैंपल देकर बाहर आ गया और बाइक स्टार्ट करके सेक्टर-25 की ओर चल दिया।

रास्ते में यही सोचता जा रहा था कि आज नौकरों के वेरिफिकेशन को लेकर भी स्टोरी करेंगे। लोग उनका पुलिस वेरिफिकेशन भी नहीं कराते हैं, जिसका फायदा उठाकर नौकर खासतौर पर लूटपाट कर देते हैं। मगर, इस केस में तो बच्ची का कत्ल ही कर दिया गया। सोच रहा था कि क्या वजह हो सकती है। जाहिर है, मुख्य वजह तो लूट ही रही होगी। मगर उस समय क्या वह घर में अकेली थी। उसके माता-पिता नहीं थे क्या घर पर। ऐसे सवालों के जवाब का पता लगाऊंगा। यह सब सोचते हुए मैं जलवायु विहार पहुंच गया। उस समय तक तो न्यूज चैनलों की ओवी वैन लग चुकी थी। घर से डेडबॉडी को पोस्टमॉर्टम के लिए ले जाने की बात चल रही थी, परंतु मीडिया को अब भी घर में जाने नहीं दिया जा रहा था। हालांकि, सीढ़ियों पर बैठे रहने के दौरान हम लोगों ने कई बार घर में जाने की कोशिश की थी, मगर पुलिसवाले भी अपनी जिद पर थे। क्राइम सीन को डिस्टर्ब न किया जाए, यह दुहाई देकर मीडिया वालों को रोक ले रहे थे। एंट्री वाले स्थान पर ही कई पुलिसकर्मियों के साथ नए एएसपी खुद ही तैनात थे। कुछ पूछने पर एएसपी जवाब नहीं दे रहे थे। बस इतना बताते थे कि एसएसपी या दूसरे अधिकारी ही ब्रीफ करेंगे।

इसके बाद मैं वहां खड़े कई मीडियाकर्मियों से बात करने लगा। उस दौरान पता चल गया कि जब रात में घटना हुई तो लड़की के माता-पिता घर में ही थे। सुबह कोई नौकरानी आती है। उसने जब घर पहुंचकर घंटी बजाई, उसके बाद ही पैरेंट्स को कत्ल का पता चला। इसी बीच, नोएडा के एसपी सिटी महेश मिश्रा मौके पर पहुंचते हैं। वहां पहुंचते ही सीधे उस कमरे में जाते हैं, जहां कत्ल हुआ था। वहां पर तकरीबन 40 मिनट बिताने के बाद वह मीडिया के सामने लड़की का एक पुराना फोटो और नौकर का पासपोर्ट लेकर आते हैं। सभी मीडियाकर्मी उन्हें घेर लेते हैं। माइक और कैमरा लगते ही पूछा जाता है कि आखिर कैसे हुई है घटना?

इस पर जवाब मिलता है कि 13 साल की आरुषि डीपीएस में पढ़ती थी। वह डॉक्टर दंपति की इकलौती लड़की थी। काफी होनहार थी। 15 मई की रात में वह अपने कमरे में थी। सुबह नौकरानी भारती ने जब कई बार डोरबेल बजाई, तब डॉ. नूपुर तलवार गेट पर पहुंचीं। नौकर हेमराज लापता था। वह नेपाल के अरघाखांची का रहने वाला है। उसका पासपोर्ट मिला है। उसी ने रात में आरुषि का मर्डर कर दिया और भाग गया। उसकी तलाश के लिए पुलिस की कई टीमें लगा दी गई हैं। एक टीम उसके नेपाल वाले घर की तरफ भी भेजी जा रही है। इसके अलावा डेडबॉडी को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा जा रहा है। रिपोर्ट के बाद ही अन्य घटनाक्रम के बारे में कुछ बताया जा सकेगा।….इस तरह एसपी सिटी ने काफी कुछ बता दिया था..लेकिन मीडिया तो मीडिया…..अब भी कई सवाल पूछे …कि क्या माता-पिता घर पर ही थे तो उन्हें मर्डर का पता क्यों नहीं चला….घर के आसपास वालों को भी भनक नहीं लगी…..सबसे पहले घटना के बारे में पुलिस को किसने बताया….और भी कई सवाल….यह सुनकर एसपी सिटी बोले…देखिए अभी जांच चल रही है….आगे आपको बताया जाएगा…यह कहते हुए उन्होंने एक पुलिस वाले से कहा कि देखो कोई भी घटनास्थल के आसपास या कमरे में नहीं पहुंचना चाहिए…सिवाय पुलिस के।

उसी दौरान घर में से आरुषि की डेडबॉडी लाई जाने लगी। कपड़े में लिपटी हुई थी आरुषि। एक पुलिसकर्मी और एक अन्य शख्स बॉडी को पकड़कर नीचे ला रहे थे। महज 4-5 कदम पीछे घनी दाढ़ी वाला एक व्यक्ति भी आ रहा था। टी-शर्ट और हाफ पैंट पहने हुए। चश्मा पहना हुआ, दूसरे शख्स ने उस दाढ़ी वाले के गले में अपना हाथ डाल रखा था। शायद, सांत्वना दे रहा था। तभी दाढ़ी वाला अचानक बोल पड़ा… आरुषि बेटा को नीचे नहीं रखना। यह कहते हुए उसके भाव बिल्कुल देखने वाले थे। अजीब सी मायूसी। यह देखते ही तमाम चैनल वालों के कैमरे के निशाने पर वही शख्स हो गया। अब अंदाजा लग चुका था कि वही आरुषि का पिता है। वहां मौजूद एक व्यक्ति से पूछा तो उसने बताया कि दाढ़ी वाला आदमी डॉ. राजेश तलवार है। उसी की बेटी थी आरुषि, जिसका रात में कत्ल हो गया। डेडबॉडी को पकड़ने वाला दूसरा शख्स डॉ. राजेश का भाई डॉ. दिनेश तलवार है। मगर, उस समय घर के आसपास से किसी के खुलकर रोने-धोने की आवाज नहीं आ रही थी। जैसे आमतौर पर किसी की हत्या या मौत पर होता है। काफी लोग रोते-बिलखते हुए मिलते हैं। यहां अजीब सा सन्नाटा था। अगर चहल-पहल थी तो वो मीडियावालों की ही थी। वे सवाल-जवाब और खोजबीन में इधर-उधर बातचीत करते हुए नजर आ रहे थे। कभी पुलिसवालों से उलझ जाते थे। यह कहते हुए कि घटनास्थल पर क्यों नहीं जाने दिया जा रहा है।

इसी बीच, दाढ़ी वाला शख्स डॉ. राजेश तलवार गुस्से में और काफी भावुक भी होते हुए दिखा। वह एक पुलिसवाले से यह कहते हुए लड़ने लगा कि कोई चैनल वाला बेटी के साथ रेप की बात क्यों चला रहा है। दरअसल, उस समय एक चैनल ने आरुषि से रेप की आशंका की खबर भी ब्रेकिंग पर चला दी। इस बारे में किसी पड़ोसी ने राजेश तलवार को बताया था। यह जानकर वह भड़क गया था। मीडिया पर सवाल भी उठाने लगा। उसी दौरान जिस चैनल ने यह न्यूज दी थी, उसके रिपोर्टर ने उस ब्रेकिंग को हटा दिए जाने की बात कही। इसके बाद वहां फिर से शांति हो गई। घरवाले डेडबॉडी का पोस्टमॉर्टम कराने के लिए चले गए। कई पुलिसवाले भी साथ ही निकले। मगर, मीडिया की एंट्री पर रोक लगाने के लिए अब भी कई तैनात थे। इसलिए मैं दूसरे तरीके से न्यूज में खास एंगल निकालने में जुट गया।

दरअसल, न्यूज में कुछ खास पता करने के लिए आसपास के लोगों से बेहतर कोई दूसरा स्रोत नहीं होता है। लिहाजा, पास में ही गया तो एक सब्जी वाला मिला। नाम अकरम। थोड़ी देर बात की तो पता चला कि नौकर हेमराज अक्सर उसकी दुकान से सब्जी लेता था। अकरम ने बताया कि हेमराज कल भी आया था सब्जी लेने। उसने मेरे मोबाइल से एक कॉल भी की थी, लेकिन उससे ज्यादा बात नहीं हो पाई। हेमराज ने बताया था कि उसे अभी कई काम हैं, इसलिए वह चला गया था। मैंने पूछा, क्या वजह होगी, कुछ आइडिया। जवाब मिला, मुझे कुछ नहीं पता। फिर मैंने पूछा कि आखिर वह किस तरह का व्यक्ति था। अकरम ने बताया कि काफी शांत रहता था। किसी से ज्यादा बात नहीं करता था। अपने काम से ज्यादा मतलब रखता था। डॉक्टर के घर सब्जी वही ले जाता था। उसी दौरान उससे बात होती थी। इसके बाद मैं सीधे एक सवाल पर आ गया। क्या नौकर कत्ल कर सकता है, आपको क्या लगता है। अकरम बोला, वैसे कौन क्या करेगा, यह तो नहीं कहा जा सकता है। मगर, वह बड़ा सीधा लगता था। पता नहीं क्यों और कैसे कत्ल कर दिया, कुछ समझ में नहीं आ रहा है। यह जानकर मैं भी थोड़ा परेशान हुआ कि मुझे कोई नया एंगल नहीं मिला। नौकर कातिल था, पर वह कितना शातिर था, इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई थी। अकरम ने उसे सीधा-साधा ही बताया था। उसके बारे में कोई ऐसी बात नहीं बताई, जिससे उसे कातिल व साजिश रचने जैसा माना जा सके।

लेकिन उस समय तक की जांच के हिसाब से तय था कि हेमराज ने ही कत्ल किया था, क्योंकि वह घर से लापता था। इसलिए मेरा पूरा फोकस इस पर था कि आखिर वह कब से काम कर रहा था। उसका बैकग्राउंड क्या था। व्यवहार कैसा था लोगों के प्रति। वेरिफिकेशन का तो पता चल गया था कि नहीं हुआ है। वैसे वेरिफिकेशन के लिए अगर पुलिस को फॉर्म भरकर दिया भी जाता तो उसका कोई फायदा नहीं होता। क्योंकि जब यूपी और देश के ही विभिन्न शहरों से आए लोगों का वेरिफिकेशन आज तक नहीं हुआ है तो नेपाल के व्यक्ति का वेरिफिकेशन आखिरकार नोएडा पुलिस कहां से कर पाती।

खबर के लिए सबसे खास पहलू था कि आखिर आरुषि कैसी थी? उसका परिचय। पढ़ने में कैसी थी? क्या शौक थे? इस तरह की बातें। इस बीच शाम के 4 बजने वाले हुए तो ऑफिस पहुंचना पड़ा। ऑफिस पहुंचकर सबसे पहले नोएडा के सेक्टर-20 पुलिस स्टेशन के इंचार्ज दाताराम नौनेरिया को फोन किया। दरअसल, किसी भी क्राइम केस में यह पता करना जरूरी होता है कि आखिर एफआईआर में क्या लिखा गया है। थाना इंचार्ज ने बताया कि अभी एफआईआर हो रही है। उसमें लिखा जा रहा है कि डॉ. राजेश तलवार के घर में हेमराज रहता था, जो नेपाल का रहने वाला था। किसी धारदार हथियार से उसने आरुषि की हत्या कर दी और फरार हो गया। इस तरह आईपीसी की धारा-302 में मामला दर्ज किया जाएगा। मैंने पूछा कि हेमराज की तलाश के लिए क्या किया जा रहा है। जवाब मिला कि पुलिस की एक टीम नेपाल भेज दी गई है। ट्रेनों में भी खोजबीन जारी है। जल्द पकड़ा जाएगा। इसके बाद अन्य कोई सवाल पूछता, तब तक फोन कट गया। मैं समझ गया कि थानेदार से कोई पुलिस अधिकारी कुछ जानकारी मांग रहा होगा। वैसे भी एक दिन बाद वीवीआईपी (प्राइम मिनिस्टर) की विजिट है तो शहर में उसकी भी तैयारी चल रही है।

इसके बाद मैंने क्राइम ब्रांच के एक अधिकारी को फोन किया। वह भी इस केस की जांच से जुड़े थे। उनसे पूछा कि नेपाली नौकर हेमराज किस तरह का है। उसके बारे में कोई खास जानकारी बताइए। क्राइम ब्रांच के उस अधिकारी ने बताया कि हेमराज पहले मलयेशिया में कुक था। करीब 8 महीने पहले ही डॉ. राजेश के घर काम पर आया था। उसे तलवार के पुराने नौकर विष्णु ने अपनी जगह पर रखवाया था। इसके बाद मैंने उनसे आरुषि की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट की जानकारी मांगी। तब पता चला कि दोपहर में पोस्टमॉर्टम हुआ, लेकिन पूरी डिटेल कल मिल पाएगी। इसके बाद मैंने न्यूज लिखकर भेज दी। अगले दिन अखबार में खबर आई कि नोएडा में डॉक्टर दंपति की बेटी का कत्ल। नौकर फरार। भरोसे का कत्ल ।

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