एक दरोगा का दर्द… जिसे सुनकर आप रो पड़ेंगे

एक ट्रेनी दरोगा ने पुलिस सिस्टम से हारकर दी जान, खोली ऐसी पोल, जिसे सुनकर हो जाएंगे हैरान…

मैं शहीद इसलिए हो रहा हूंं ताकि लोग पुलिस के पुराने एक्ट के दबाव में आत्महत्या न करते रहें… कहकर फांसी लगाई

अंडर ट्रेनी दरोगा.. कुलदीप चौधरी

कई बार या अक्सर सुनते होंगे कि पुलिस के परेशान करने से किसी मासूम ने आत्महत्या कर ली। पुलिस उत्पीड़न से परेशान होकर आत्मदाह कर लिया। वगैरह…वगैरह…. पर आज यह बात काफी अलग है। एक स्मार्ट पुलिसकर्मी जिसने हाल में यूपी पुलिस को ज्वाइन किया। वह भी बतौर सब इंस्पेक्टर। पहले टीचर हुआ करते थे। मगर वहां जब बात आत्मसम्मान पर आंच आई तो नौकरी छोड़ दी। सरकारी नौकरी और देश की सेवा करने की खातिर पुलिस में भर्ती हुए। अच्छे नंबरों के साथ यूपी में दरोगा की भर्ती पास की। सहारनपुर में अंडर ट्रेनी तैनात भी हो गए। मगर तैनाती के बाद उन्हें ऐसी बातें समझ में आईं कि ये पुलिस की नौकरी जैसी बाहर से धाकड़ दिखती है, असल में अंदर से वैसी है नहीं।

अंदर ऐसी तमाम बातें हैं जो आत्मसम्मान तक को झकझोर कर रख देती है। कोई इसे स्वीकार कर लेता है। कोई बोझ की तरह ढोता रहता है। कोई घुंट-घुंट कर जीने लगता है। मगर सबसे बड़ी चुनौती तब आती है जब प्राइवेट नौकरी में दिक्कत आने पर तो लोग इसे बदल भी लेते हैं मगर बड़ी मुश्किल से मिली सरकारी नौकरी, वो भी पुलिस की, कैसे छोड़ दे। अगर छोड़ भी दें तो उस समाज के सामने क्या कहेंगे जिसने नौकरी मिलने पर वाहवाही करते हुए सबके सामने सम्मानित किया था। उनसे क्या कहेंगे कि ये घुंट-घुंट कर जीने वाली नौकरी है। पुलिस परेशान करती है तो लोग मीडिया, मंत्री और बड़े स्तर पर शिकायत कर देते हैं और सुनवाई भी होती है और पुलिस विभाग में कोई किसी के उत्पीड़न की शिकायत करे तो पाप की तरह समझा जाता है.. ऐसा करने पर शायद उसका उत्पीड़न पहले से ज्यादा ही बढ़ जाता है। इन्हीं बोझ के तले दबकर एक होनहार ट्रेनी दरोगा ने मौत को गले लगा लिया।

1861 में बना पुराना पुलिस एक्ट ही बन रहा है मौत का बड़ा कारण, इसे बदला जाए….

इस दरोगा का नाम है कुलदीप चौधरी। इन्होंने जान देने से पहले एक ऑडियो बनाकर अपने परिजनों को भेजा है। जिसमें साफ कहा है कि वह कायरता का काम जैसा कदम तो उठा रहे हैं लेकिन उसके पीछे कायरता नहीं बल्कि भारत में 1861 में बना पुलिस एक्ट है। पुलिस की कार्यशैली है। छुट्‌टी का नहीं मिलना और बोझ बढ़ना है। अपने ऑडियो में कहा है कि …आज मैं शहीद होने जा रहा हू ताकि विभाग के लोग आगे आत्महत्या जैसा कदम न उठाएं…वह यह भी कहते हैं कि आत्मसम्मान ही जीवन की पूंजी थी, मगर वही नहीं रही। प्राइवेट नौकरी होती तो शायद छोड़कर जी लेता मगर सरकारी नौकरी के लिए मेहनत की, कैसे छोड़ सकता हूं। ये जीवन का सपना था, छोड़ न पाया, इसलिए शहीद हो रहा हूं, लेकिन ये उनके लिए है जिससे पुलिस के उन लोगों का भला हो जाए ताकि मोक्ष मिल सके।


काफी भावुक थे कुलदीप, इसलिए मरने से पहले भी अपनी लिखीं कविताएं पढ़ीं, दिया संदेश
कुलदीप चौधरी (32) मूलरूप से मुजफ्फरनगर के भोपा थाना क्षेत्र के गांव जंधेड़ी के रहने वाले थे। चार माह से सहारनपुर जिले के देवबंद कोतवाली की रणखंडी चौकी पर बतौर ट्रेनिंग दरोगा तैनात थे। उनका परिवार मेरठ के कंकरखेड़ा की श्रद्धापुरी कॉलोनी में रहता है जबकि कुलदीप कस्बे में रेलवे रोड पर किराए के मकान में अकेले रहते थे। 31 जनवरी को इनका शव आवास में संदिग्ध हालात में फंदे पर लटका मिला था। इसकी जांच में उनके पास से मोबाइल में ऑडियो क्लिप और चौकी की डायरी में सुसाइड नोट भी मिला था। जिससे पता चला कि इन पर काम का काफी दबाव था और कई सीनियर तो सम्मान करते थे लेकिन ज्यादातर सख्ती और दबंग जूनियर भी इनके सामने हेकड़ी दिखाते थे। इसकी शिकायत करने पर भी कोई सुनवाई नहीं होती थी। जिससे ये टूट गए थे। इसीलिए मरने से पहले ऑडियो क्लिप में बोला है कि..

ग़म के आंसू पी गया
आज फिर वो लम्हा जी गया
मैं जीत कर भी हारा
और सारा जहां जीत गया…
सुर्खियां बंटोरती मेरी बर्बादी
छीन गई क्यों मेरी आज़ादी…

वाकई पुलिसवालों की भी आजादी छीन जाती है…

जी हां, अगर आप ये सोचते हैं कि कोई पुलिसवाला बन गया तो वो सिर्फ दूसरों पर रुतबा ही झाड़ता रहेगा, यह कहना गलत होगा। इस अॉडियो को सुनकर आप समझ जाएंगे कि पुलिसवाले जितना बाहर से सख्त दिखते हैं दरअसल हर पुलिसवाला वैसा अंदर से होता नहीं है। कई बार सिस्टम उसे ऐसा बना देता है कि वह मजबूर होकर ऐसी सख्ती दिखाने लगता है और अपने भीतर के उस उत्पीड़न को दबा लेता है जो उसे अपने सीनियर्स या कई बार जूनियर से भी मिलता है।

जूनियर भी ऐसे बर्ताव करते हैं जैसे उनका कोई नौकर हो…
यह लाइन काफी चौंकाने वाली है। यह सुनकर आम पब्लिक हैरान भी रह सकती है। मगर यह सच है। इसलिए कि कई पुलिसवालों को ऐसा झेलना पड़ता है। ऐसा इसलिए होता है कि कई बार कोई सिपाही ही इतना रसूख वाला होता है कि वह अपने से सीनियर दरोगा, इंस्पेक्टर या कई बार डीएसपी रैंक के अधिकारी को भी कुछ नहीं समझता है और धमका देता है। यहां तक की गाली-गलौज कर लेता है। इसके अलावा इसी तरह सीनियर्स भी दरोगा या सिपाहियों के साथ ऐसे ही बर्ताव कर देते हैं। मगर अनुशासन की इस नौकरी में कोई शिकायत भी नहीं कर सकता है। आलम यह है कि कोई पुलिसवाला छुट्‌टी भी नहीं ले सकता है।

अपनी बेटी की शादी हो या बीवी का इलाज, पुलिसवाले भीख की तरह मांगते हैं छुट्‌टी

यह वाकया तो आंखों देखा है। अक्सर किसी सीनियर अधिकारी के ऑफिस में आप जाएंगे तो ऐसी स्थिति आपको देखने को मिल सकती है।
एक पुलिस वाला हाथ में रजिस्टर लेकर सैल्यूट करते हुए अधिकारी के कमरे में दाखिल होता है।
उस समय अधिकारी कई बार व्यंग्य में हंसते हुए कहता है कि… अरे, आ गए। बताओ क्या चाहिए।
इससे पहले, हाथ में रजिस्टर लिए पुलिसकर्मी कुछ कह पाता, उससे पहले अधिकारी कह देते हैं… देखो भाई, छुट्‌टी मत मांगना, भले कुछ मांग लेना। अब पुलिसकर्मी हैरान रह जाता है। अब मुंह बनाए खड़ा हो जाता है। क्या बोले, बेचारा। अधिकारी फिर पूछता है क्या बात है.. बताओ।
पुलिसकर्मी बोलता है…साहब छु्ट्‌टी चाहिए।
अधिकारी कई बार डांटते हुए…क्या बहाना है, बता ही दो। पुलिसकर्मी बताता है कि साहब बेटी की शादी है।
अधिकारी, अरे कार्ड दिखाओ।
पुलिसकर्मी.. ये देखिए साहब, कम से कम एक महीने की छुट्‌टी तो चाहिए ही।
अधिकारी… एक महीने। अरे घर में कोई नहीं है क्या। ज्यादा से ज्यादा 15 दिन की मिलेगी। अगर लेना है तो लो वरना देख लो। क्या पता कार्ड भी फर्जी बनवा लिया हो। …अक्सर ऐसी बातें आती हैं। इसी तरह घर में बीवी या मां या बच्चे भी बीमार हों तो ज्यादा से ज्यादा एक या दो दिन की छुट्‌टी मिलती है। वो भी अहसान के साथ। ऐसे में पुलिसकर्मी की मानसिक हालत क्या होगी। खैर, आप यह पूरा ऑडियो सुनिए तो समझ आ जाएगा कि आखिर यूपी में आए दिन पुलिसकर्मी आत्महत्या क्यों कर रहे हैं। आखिर, पुलिसवालों के लिए, उनकी मानवता के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठा रहा है?

आखिर कब तक पुलिसकर्मी भी सहते रहेंगे…इनके लिए कोई आगे क्यों नहीं आता है…


Note – अॉडियो क्लिप अपलोड होने में दिक्कत हो रही है, जल्द ही अपडेट करेंगे। धन्यवाद 

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